ये रौशनी तुम्हें दिखाने कि क़वायद में
बहुत कुछ राख हो गया मेरे अंदर
मुस्कुराहटों के ख़रीदार तुमको अंदाज़ा ही नहीं
क्या कुछ बिक गया मेरे अंदर
तुम भी कमाल हो मुझसे रास्ता पूछने वाले
कभी रहा करते थे तुम मेरे अंदर
इस पत्थर कि नक्काशी के क़द्रदान तुम क्या जानो
कोई चीज़ धड़का करती थी कभी इसके अंदर
इस चलती हुई परछाईं को गौर से देखो
कभी इंसान हुआ करता था इसके अंदर

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