Saturday, October 6, 2012

पंछी


एक पुराना मकान था 
जिसकी दीवारें 
एक आदमी के सारे जीवन के संघर्ष 
और उसकी पत्नी के नींव जैसे साथ से
बनी हुई थीं 
वहां घोंसले बने हुए थे 
छत के ऊपर भी 
और उसके नीचे भी 
दोनों ओर के पंछी जब छोटे थे 
तब उनका पेट भरने के लिए
उनके मुंह में दाना डालना पड़ता था 
सर्दी से बचाने के लिए 
पंख रज़ाई बन जाते थे 
फिर छोटे पंछियों के पर निकलने शुरू हुए 
छत के ऊपर वाले उड़ कर 
मंदिर के पीपल तक जाने लगे 
और नीचे वाले स्कूल 
ये दुनियादारी के प्रथम अध्याय का श्री गणेश था 
दाना पानी का इंतज़ाम और घोंसले की देख रेख 
अब भी उनकी थी जिन्होंने इसे बनाया था 
गर्मियों के दिनों में दूर गाँव के मेहमान आते थे 
छोटे पंछी बहुत शोर मचाते थे 
जब बारिश होती थी तब भी
भीगे परों के बावजूद 
बड़े पंछी दाना पानी ला ही देते थे  
कम कभी कुछ नहीं हुआ 
अगर हुआ भी तो 
छोटे पंछियों को पता नहीं चला 
बड़े पंछी छोटों की उड़ान के लिए 
मेहनत करते करते 
उम्र की ढलान तक पहुँच गए 
छोटे पंछी अब छोटे नहीं थे ...दुनिया के लिए 
वो उड़ गए उस मकान को छोड़ कर 
अपनी ख़ुद की पहचान बनाने के लिए 
बड़े पंछी एक बार फिर भीग गए 
इस बार बारिश आँखों से हुई थी 
छोटे पंछियों को इस बार भी पता नहीं चला 
वो ख़ुशी से चहकते रहे 
और बड़े इसी चहचहाहट को सुन 
मुस्कुराते रहे ...बाहर से 
अंतर की पीड़ा के बावजूद 
चेहरे पर मुस्कान दिखाने के 
वे अभ्यस्त हो चुके थे 
क्यूंकि दर्द भी एक मेआद के बाद 
अपनी तासीर खो देता है 
छोटे पंछी अब साल में सिर्फ़ एक बार आते थे 
और मकान फिर से आबाद हो जाता था 
छत के ऊपर भी
और छत के नीचे भी 

(मेरे बड़े पंछियों को समर्पित जिनमें से एक अब नहीं है )

संदीप 

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