एक पुराना मकान था
जिसकी दीवारें
एक आदमी के सारे जीवन के संघर्ष
और उसकी पत्नी के नींव जैसे साथ से
बनी हुई थीं
वहां घोंसले बने हुए थे
छत के ऊपर भी
और उसके नीचे भी
दोनों ओर के पंछी जब छोटे थे
तब उनका पेट भरने के लिए
उनके मुंह में दाना डालना पड़ता था
सर्दी से बचाने के लिए
पंख रज़ाई बन जाते थे
फिर छोटे पंछियों के पर निकलने शुरू हुए
छत के ऊपर वाले उड़ कर
मंदिर के पीपल तक जाने लगे
और नीचे वाले स्कूल
ये दुनियादारी के प्रथम अध्याय का श्री गणेश था
दाना पानी का इंतज़ाम और घोंसले की देख रेख
अब भी उनकी थी जिन्होंने इसे बनाया था
गर्मियों के दिनों में दूर गाँव के मेहमान आते थे
छोटे पंछी बहुत शोर मचाते थे
जब बारिश होती थी तब भी
भीगे परों के बावजूद
बड़े पंछी दाना पानी ला ही देते थे
कम कभी कुछ नहीं हुआ
अगर हुआ भी तो
छोटे पंछियों को पता नहीं चला
बड़े पंछी छोटों की उड़ान के लिए
मेहनत करते करते
उम्र की ढलान तक पहुँच गए
छोटे पंछी अब छोटे नहीं थे ...दुनिया के लिए
वो उड़ गए उस मकान को छोड़ कर
अपनी ख़ुद की पहचान बनाने के लिए
बड़े पंछी एक बार फिर भीग गए
इस बार बारिश आँखों से हुई थी
छोटे पंछियों को इस बार भी पता नहीं चला
वो ख़ुशी से चहकते रहे
और बड़े इसी चहचहाहट को सुन
मुस्कुराते रहे ...बाहर से
अंतर की पीड़ा के बावजूद
चेहरे पर मुस्कान दिखाने के
वे अभ्यस्त हो चुके थे
क्यूंकि दर्द भी एक मेआद के बाद
अपनी तासीर खो देता है
छोटे पंछी अब साल में सिर्फ़ एक बार आते थे
और मकान फिर से आबाद हो जाता था
छत के ऊपर भी
और छत के नीचे भी
(मेरे बड़े पंछियों को समर्पित जिनमें से एक अब नहीं है )
संदीप

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