Saturday, October 6, 2012

आज़ाद मैदान


तुम हिन्दू जलाओ 
हम मुसलमान जलाते हैं 
अपना ही घर जला कर 
चलो त्यौहार मनाते हैं 

दुनिया भी जान ले कैसी
तरक्क़ी  पे हैं 
अपने ही चराग़ों से अपना घर जलाते हैं 
जिसकी दुकान जलती है 
उसको हथियार चलाने नहीं आते 
और बलवाई किसी मज़हब के 
दायरे में नहीं आते

आपने अकेले में तमाचा मारा होता 
तो ठीक था 
मोहल्ले के सामने ये तमाशे 
ज़रा समझ नहीं आते 
इन्टरनेट पे दुनिया मोहल्ला हो गयी है 
सब देख रहे हैं 
जाहिलों को ये नए ज़माने समझ नहीं आते 

Olympic में इस बार गोल्ड ज़रूर ले आते 
कमबख्त ये बसें जलाने के खेल 
खेलों की लिस्ट में नहीं आते 
हिन्दू की अम्मा हो 
या मुसलमान की अम्मी
दोनों ही रोती हैं 
जब बच्चे लौट कर घर नहीं आते 

संदीप 

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