तुम हिन्दू जलाओ
हम मुसलमान जलाते हैं
अपना ही घर जला कर
चलो त्यौहार मनाते हैं
दुनिया भी जान ले कैसी
तरक्क़ी पे हैं
अपने ही चराग़ों से अपना घर जलाते हैं
जिसकी दुकान जलती है
उसको हथियार चलाने नहीं आते
और बलवाई किसी मज़हब के
दायरे में नहीं आते
आपने अकेले में तमाचा मारा होता
तो ठीक था
मोहल्ले के सामने ये तमाशे
ज़रा समझ नहीं आते
इन्टरनेट पे दुनिया मोहल्ला हो गयी है
सब देख रहे हैं
जाहिलों को ये नए ज़माने समझ नहीं आते
Olympic में इस बार गोल्ड ज़रूर ले आते
कमबख्त ये बसें जलाने के खेल
खेलों की लिस्ट में नहीं आते
हिन्दू की अम्मा हो
या मुसलमान की अम्मी
दोनों ही रोती हैं
जब बच्चे लौट कर घर नहीं आते
संदीप

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