मैं B.T. खाता हूँ
B.R.T में चलता हूँ
मेरी कनपटी पे E.M.I है
जेब में टिक टिक
करता क्रेडिट कार्ड
जानता हूँ ज़्यादती है
पर बोल नहीं सकता
आम हूँ मैं ख़ास से
उजझ नहीं सकता
तुम्हारी भूख मेरी भूख
से अलग है
तुम अंधेरों को रौशनी के
शज़र बेच दोगे
रोटियों से तुम्हारा
कुछ होता नहीं अब
तुम सारे के सारे शहर बेच दोगे
ज़िन्दों की बस्तियां कुछ
कम ही बची हैं
तुम मौक़ा लगेगा
क़बर बेच दोगे
तुम्हारे लिए जो
मुफ़ीद होगी तो तुम
अफ्वाह को बना कर
ख़बर बेच दोगे
संदीप

No comments:
Post a Comment