हड्डियों को सिहरा देने वाली ठण्ड
और चमड़ी का रंग बदल देने वाली धूप के बावजूद
उन्होंने खेतों में हल चलाए
और उस ज़मीन से उगने वाली फसल के हिसाब से
अपने त्यौहार तय कर लिए
झुर्रियों से भरे चेहरों पर
लहलहाती हुई फसल की चमक
पूरे साल की मेहनत का ईनाम बनकर
किसानों की सुख शान्ति का साधन बनती थी
एक पेड़ के नीचे बैठ कर परिवार
सुकून की रोटी खाते थे
और धन के नाम पर होते थे
कुछ मवेशी और अपना खेत
ये महत्वाकांक्षी ना होने की हद थी
लेकिन दुनिया जीतने की
हम में कब कौनसी ज़िद थी
फिर अचानक सरकार को देशभक्ति याद आई
और औद्योगिक विकास के नाम पर
जो ज़मीन त्यौहार तय करती थी
छीन ली गयी
दीवाली तो फिर भी आई
पर दियों में तेल नहीं बचा
बांग्लादेशियों को पालने वाली सरकार के पास
अपने किसानों को देने के लिए funds नहीं थे
सो मुआवज़े के नाम पर तय की गईं कौड़ियां
किसान क्यारियाँ छोड़ कर चढ़ने लगे
अदालत की सीढ़ियाँ
वो आँखें जिन्हें मौसम के दांव पेंच पता थे
कोर्ट-कचहरी की गणित में मार खा गईं
अंगद का पैर भले ही हिल जाता
पर दलालों के बीच file
बिना रिश्वत के नहीं हिलती
धीरे धीरे मवेशी बिके फिर जेवर
और फिर घर
फिर महानगरों के चौराहों पर
भीख मांगते हुए लाखों photogenic चेहरे दिखे
कुछ के लिए वो ethnic face थे
तो कुछ के लिए Real India
किसान भगवान् के नाम पर मांगते रहे
और नेता किसान के नाम पर
और सरकार ??
सरकार का कोई चेहरा नहीं होता
वो तो कुछ मजबूर लोगों का गठबंधन होता है
हम मजबूर लोग एक दूसरे की मजबूरी
अगर ना भी हो तो समझ लेते हैं
इसीलिए जो जैसे चलाता है
चलने लगते हैं
और एक दिन थक कर गिर जाते हैं
डॉक्टर अपनी भाषा में मौत का कारण लिख देते हैं
इस तरह हत्या तो होती है
पर हत्यारा कोई नहीं !!
संदीप

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