जो थमा हुआ था जम गया
जो बढ़ चला वो खून था
जो रुक गयी वो सांस थी
जो रह गया वो हौसला
जो ओढ़ ली सो शर्म थी
उघड़ गया सो कफ़्न था
जो चल रही थी लाश थी
जो दफ़्न थी वो ज़िन्दगी
फ़िज़ूल था जो मिल गया
जो खो गया सो इश्क़ था
जो बना के गुमाँ हो गया
वो आशियाँ था रेत का
संदीप

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