मुझे ग़लत ठहराना आसान है
क्यूंकि मैं तुम नहीं हूँ
सही सिर्फ़ तुम हो सकते हो
तुम्हारे हालात के हिसाब से
मजबूर भी सिर्फ़ तुम हो सकते हो
मैं सिर्फ़ मैं हो सकता हूँ
और मैं सिर्फ़ ग़लत हो सकता हूँ
जहां ज़रुरत हो मुझे टुकड़ों में
सही ठहरा देना
जब दिल करे मुझे चलता करना
जब जी चाहे ठहरा लेना
तुम सिर्फ़ मेरी सतह पर
कुछ हलचल कर सकते हो
मेरी गहराई का तुम्हें अंदाजा ही नहीं
मंथन करते तो शायद अमृत भी मिल जाता
जो मैं करता हूँ वो समझ नहीं पाओगे
तुम लहरों के शोर से मुझे आँकोगे
जितनी तुम्हारी हैसियत है उतनी मेरी कीमत लगाओगे
तुम ये समझ ही नहीं पाओगे
कि समंदर बिक नहीं सकता
संदीप शर्मा

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