Saturday, October 6, 2012

आवारगी


आवारगी जहां भी ले जाती है
वहां लोगों को सिर्फ़ जोड़ती है
ये लोगों को बांधती है
पर उम्मीदें नहीं बंधने देती
टूटते लोग नहीं हैं
टूटती हैं उम्मीदें
उम्मीदें वहीं होती हैं, जहां बंधन होता है
लेकिन सवाल ये है- कि बंधना कौन चाहता है
लोग बंध जाते हैं -अपनी ही उम्मीदों के मकड़जाल में
मकड़ियां उड़ नहीं सकतीं
वो सिर्फ़ अपने जाल में शिकार फंसने का इंतज़ार करती हैं
जो जाल दूसरों के लिए बनाया उसमें ख़ुद फँसी रह जाती हैं
उड़ते हैं पंछी-
सपनों के पर लगा कर अपनी सीमाओं के परे
आवारगी ये खुशफ़हमी तो दे ही देती है
कि तुम्हारा हक़ सिर्फ़ ज़मीन पर ही नहीं है
शायद तुम कुछ तारे बटोर सकते हो
चाँद तुम्हारी ज़द में है
सूरज की कुछ चमक के तुम भी हिस्सेदार हो
नीला समंदर नापा जा सकता है
लेकिन -
हो सकता है कि ये सब ना भी हो
लेकिन एक छोटेपन की हक़ीक़त जीने से
एक सुनहरे ख्वाब में मर जाना कहीं अच्छा है
संदीप शर्मा

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